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Title : Shabad : Gyan suna de - Sant Rampal Ji Maharaj
Description :

बंदिछोड़ जगतगुरु तत्वदर्शी संत श्री रामपाल जी महाराज जी की जय हो

।।शब्द।। (ज्ञान सुनादे---------)

ज्ञान सुना दे विधि बता दे, हो मेरा कल्याण, भक्त मैं अर्ज करूं।
धर्मदास जब नू बोला, अठसठ तीर्थ नहाऊँगा।
गीता जी का पाठ करत हूँ, इस विधि मुक्ति पाऊँगा।
राम-कृष्ण के गुण गाऊँगा, मिले स्वर्ग में अस्थान।।1।।

तीर्थ जल में कच्छ और मच्छा, जीव बहुत से रहते हैं।
उनकी मुक्ति ना होती वो, कष्ट बहुत सा सहते हैं।
सतयुग में राम-कृष्ण नहीं थे, तब किसका धरते ध्यान।।2।।

एकादशी का व्रत करत हूँ, जीव हिंसा कोए करता ना।
शिवलिंग पूजा गुरु की सेवा, किए बिना भी सरता ना।
शालिग्राम की पूजा करता, हर रोज सुबह और शाम।।3।।

व्रत करे से मुक्ति हो तो, अकाल पड़ै क्यों मरते हैं।
शिवलिंग पूजा शालिग सेवा, अनजाने में करते हैं।
चेतन हो कर भूल रहे, हुए पत्थर से निफराम।4।।

तीर्थ बाट चले जो प्राणी, जीव बहुत से मारे है।
जल में सूक्ष्म जीव बहुत हैं, स्नान करत सिंघारै है।
चैका देवो हवन करो, होवै हिंसा बे अनुमान।।5।।

सात द्वीप नौऊं खण्ड, सपने जैसा खेल है।
तीन लोक और भुवन चतुर्दश, काल बलि की जेल है।
महाप्रलय में नष्ट हो जावै, फिर कहाँ करो विश्राम।।6।।

पाठ आरती धर्म दुवा से, खेत सँवारा जाता है।
सतनाम बीज जो बोवै, फल भक्ति का खाता है।
काल जीव को उलझाता है, देकर अपना ज्ञान।।7।।

इतनी कहकर साहेब कबीर, अंतध्र्यान होया जी।
अपनी गलती जान धर्मदास, फूट-फूट कै रोया जी।
भूल में जीवन खोया जी, अब हो गया सच्चा ज्ञान।।8।।

पाखण्ड पूजा सबहीं छोड़ी, मन चाहा ना तीर्थ नहाने को।
वापिस घर को चल पड़ा, तज वृंदावन बरसाने को।
हे बन्दी छोड़ तेरे पाने को, अब खो दू अपनी जान।।9।।

रो-रो रूदन मचावन लागा, एक धर्म यज्ञ रचाई जी।
दीनदयाल दया के सागर, आकर सूरत दिखाई जी।
रामपाल मुक्ति तब पाई, जब मिले कबीर भगवान।।10।।

सत साहिब
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